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चरवाहे और बैल की कहानी

यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान सभी जीवों में हैं।

Charwahe aur bail ki kahani

कहानी एक बार की बात है, एक शांत नदी के किनारे गहरे जंगल में एक बुद्धिमान योगी रहते थे। वे अपने दिन ध्यान, अध्ययन और प्रार्थना में बिताते थे। कुछ दूरी पर एक चरवाहा रहता था। वह गरीब था और कभी स्कूल नहीं गया, लेकिन उसका हृदय बहुत दयालु और जिज्ञासु था।


हर दिन जब वह अपनी गायों को चराता, तो योगी को घंटों ध्यान में बैठे देखता। एक दिन वह पास गया और बोला, “महात्मा, क्या आप मुझे भगवान तक पहुँचने का तरीका बता सकते हैं?”


योगी अपने ज्ञान पर गर्व करते था पर उन्होंने विनम्रता से कहा, “तुम एक अच्छे ग्वाले हो। अभी तुम्हारा कर्तव्य अपनी गायों की देखभाल करना है। भगवान को समझना बहुत बड़ी बात है — शायद यह तुम्हारे लिए आसान न हो।”


चरवाहा वहाँ से चला गया, लेकिन उसके हृदय में भगवान को जानने की गहरी इच्छा जाग उठी। अब वह न ठीक से खा पाता था, न सो पाता था।

कुछ दिनों बाद, वह फिर योगी के पास आया और बोला,“कृपया, मुझे भगवान के बारे में कुछ तो सिखाइए।”


योगी ने आह भरी। चरवाहे की सच्ची भावना देखकर उन्हें उसकी बात सुननी पड़ी।


योगी बोले, “ठीक है, मैं तुम्हें भगवान के बारे में कुछ बताता हूँ।”


चरवाहा उत्साह से बोला, “भगवान कैसे हैं? उनका रूप कैसा है?”


योगी मुस्कुराए और धीरे से बोले, “भगवान तुम्हारे झुंड के बड़े बैल जैसे हैं — बलवान, करुणामय और हमेशा तुम्हारे पास। तुम उन्हें उसी रूप में सोचो, इससे तुम्हारे लिए समझना आसान होगा।”


चरवाहा बहुत खुश हुआ। वह भागकर गया और रोज उस बैल की पूजा करने लगा। उसे हरी घास खिलाता, उसके पास बैठता, उससे बातें करता और पूरे प्रेम से उसकी सेवा करता। उसका सारा मन उसी में लग गया। दिन महीनों में और महीने वर्षों में बदल गए।


एक दिन जब वह बैल के पास बैठा था, उसे एक आवाज़ सुनाई दी —“मेरे पुत्र, मेरे पुत्र।”


वह चौंक गया। “क्या बैल ने बोला? यह कैसे हो सकता है!”


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लेकिन वह आवाज़ फिर आई — और इस बार उसे समझ में आया कि वह बाहर से नहीं, बल्कि उसके भीतर से आ रही थी। भगवान को जानने की उसकी गहरी इच्छा ने उसके भीतर के भगवान को जगा दिया था।


वह अपने चहरे पर शांति और आनंद लिए योगी के पास भागा।


योगी आश्चर्यचकित हुए और बोले, “तुम्हारे चहरे पर इतना तेज कैसे?”


चरवाहा बोला, “यह वरदान तो आपने ही दिया था।”


योगी ने कहा, “मैंने तो यूँ ही कहा था ताकि तुम ज़्यादा प्रश्न न पूछो!”


चरवाहा मुस्कुराया और बोला, “मैंने आपकी बात को दिल से मान लिया। मैंने उस बैल में भगवान को देखा — और अंत में उन्हें अपने भीतर पाया।”


भगवान किसी भी रूप में मिल सकते हैं, जब हम सच्चे प्रेम और श्रद्धा से उनकी सेवा करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण है — हमारे हृदय की सच्चाई।

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मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते | 

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता: || 

Mayyaveshya mano ye mam nityayukta upasate
Shraddhaya parayopetaste me yuktatama matah ||


Source: भगवद् गीता 


अर्थ

जो लोग अपना मन मुझ पर लगाते हैं और प्रेमपूर्वक प्रतिदिन मेरी पूजा करते हैं, मैं उन्हें अपना सबसे निकट और प्रिय मानता हूँ।
भगवान उन्हें प्रेम करते हैं जो पूर्ण श्रद्धा और अटूट भक्ति से उन्हें याद करते हैं।

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Story type: Spiritual

Age: 7+years; Class: 3+

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